‘बंटवारा 1947’ रिव्यू: सनी देओल की दहाड़ के पीछे छिपा इंसानियत का दर्द, शबाना आजमी ने छोड़ी गहरी छाप
‘कोई मजहब अच्छा या बुरा नहीं होता, बुरा आदमी होता है।’
‘बंटवारा 1947’ की यह सोच फिल्म की पूरी कहानी को एक लाइन में समेट देती है। 1947 का वह दौर, जब देश आजादी की खुशी मना रहा था, लेकिन उसी वक्त विभाजन ने लाखों लोगों की जिंदगी को हमेशा के लिए बदल दिया। राजकुमार संतोषी की यह फिल्म इसी इतिहास के दर्दनाक अध्याय को इंसानी रिश्तों, विस्थापन और भाईचारे की नजर से देखने की कोशिश करती है।

सनी देओल, शबाना आजमी और प्रीति जिंटा स्टारर यह पीरियड ड्रामा 14 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई है। फिल्म का निर्देशन राजकुमार संतोषी ने किया है और इसका निर्माण आमिर खान ने किया है। करीब तीन दशक बाद संतोषी और सनी देओल की जोड़ी एक बार फिर साथ आई है।
कहानी क्या है?
‘बंटवारा 1947’ की कहानी भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि में आगे बढ़ती है। फिल्म में आजादी के जश्न के बीच अचानक सामने आई बंटवारे की हकीकत को दिखाया गया है। सीमाएं खिंचती हैं, परिवार अपने घर छोड़ने को मजबूर होते हैं और धर्म के नाम पर फैली हिंसा इंसानी रिश्तों को भी कसौटी पर ला खड़ा करती है।
सनी देओल फिल्म में सिकंदर मिर्जा के किरदार में हैं, जबकि प्रीति जिंटा उनकी पत्नी हमीदा बेगम की भूमिका निभा रही हैं। शबाना आजमी दुर्गावती देवी यानी ‘माई’ के किरदार में नजर आती हैं। कहानी में सिकंदर मिर्जा और उसका परिवार पाकिस्तान पहुंचता है, जहां उन्हें एक ऐसा घर मिलता है जिसमें पहले से एक हिंदू महिला रह रही है। इसके बाद कहानी सिर्फ जमीन और घर की नहीं रहती, बल्कि इंसानियत और पहचान की लड़ाई बन जाती है।
धर्म से ऊपर इंसानियत का संदेश
फिल्म की सबसे खास बात इसका संदेश है। ‘बंटवारा 1947’ किसी एक समुदाय को कटघरे में खड़ा करने के बजाय यह दिखाने की कोशिश करती है कि हिंसा के बीच भी ऐसे लोग मौजूद थे जिन्होंने इंसानियत को धर्म से ऊपर रखा।
फिल्म के ट्रेलर में सनी देओल का किरदार साफ तौर पर कहता है कि मां को हिंदू-मुस्लिम के खांचे में नहीं बांटना चाहिए और मां अपने आप में एक मजहब है। यही विचार फिल्म की भावनात्मक रीढ़ बनता है।
निर्देशक राजकुमार संतोषी ने भी फिल्म को राजनीति के बजाय रिश्तों और मानवीय भावनाओं पर केंद्रित बताया है। वहीं सनी देओल ने कहा है कि धार्मिक विभाजन तब खत्म होगा जब इंसान खुद को सबसे पहले इंसान समझेगा।
सनी देओल ने फिर दिखाया अपना दम
सनी देओल के लिए यह भूमिका इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि वह इस बार ऐसे किरदार में नजर आ रहे हैं जो सिर्फ गुस्से और एक्शन से नहीं, बल्कि अपने फैसलों और इंसानी संवेदनाओं से मजबूत बनता है।
उनकी स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को कई जगह बड़े पर्दे वाला असर देती है। जब कहानी में तनाव बढ़ता है तो सनी देओल का किरदार सामने खड़ा दिखाई देता है। हालांकि फिल्म का मकसद केवल एक्शन दिखाना नहीं है, बल्कि उस दौर के डर और असुरक्षा के बीच इंसान के भीतर मौजूद साहस को सामने लाना है।
राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी ‘घायल’, ‘दामिनी’ और ‘घातक’ जैसी फिल्मों के लिए जानी जाती रही है। लगभग 30 साल बाद दोनों की वापसी फिल्म के प्रति दर्शकों की उत्सुकता बढ़ाने वाली बड़ी वजह है।
शबाना आजमी की अदाकारी फिल्म की बड़ी ताकत
शबाना आजमी फिल्म में बेहद अहम भूमिका निभाती हैं। उनका किरदार विभाजन के दौरान अपने घर, पहचान और अस्तित्व से जूझती एक ऐसी महिला का प्रतिनिधित्व करता है, जिसके सामने इतिहास अचानक पूरी जिंदगी बदल देने वाला फैसला बनकर खड़ा हो जाता है।
उनके अभिनय में डर, दर्द, मजबूरी और आत्मसम्मान—चारों भाव एक साथ नजर आते हैं। यही वजह है कि फिल्म के शुरुआती रिव्यू में भी शबाना आजमी के अभिनय की विशेष तौर पर तारीफ देखने को मिली है।
प्रीति जिंटा की वापसी भी खास
प्रीति जिंटा लंबे अंतराल के बाद बड़े पर्दे पर वापसी कर रही हैं। वह फिल्म में हमीदा बेगम का किरदार निभा रही हैं। उनका किरदार उस परिवार की भावनात्मक धुरी का हिस्सा है, जिसे विभाजन के कारण अपना घर और पुरानी जिंदगी छोड़नी पड़ती है।
सनी देओल और प्रीति जिंटा की जोड़ी को दोबारा पर्दे पर देखना उनके पुराने प्रशंसकों के लिए भी खास अनुभव हो सकता है।
फिल्म की सबसे बड़ी खूबी क्या है?
‘बंटवारा 1947’ की सबसे बड़ी खूबी इसका इमोशनल कोर है। फिल्म सिर्फ यह नहीं बताती कि विभाजन के दौरान क्या हुआ, बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि उस मुश्किल समय में इंसान ने दूसरे इंसान के साथ कैसा व्यवहार किया।
फिल्म में हिंसा, पलायन और डर के बीच मां-बेटे, पति-पत्नी और परिवार जैसे रिश्तों को केंद्र में रखा गया है। यही वजह है कि कहानी इतिहास से निकलकर व्यक्तिगत भावनाओं तक पहुंचती है।
राजकुमार संतोषी ने भी फिल्म को रिश्तों और मानवीय भावनाओं पर आधारित बताया है। उनके मुताबिक फिल्म का मूल विचार लोगों के साथ दया और इंसानियत से पेश आने का है।
संगीत और माहौल
फिल्म के संगीत की जिम्मेदारी ए.आर. रहमान ने संभाली है, जबकि गीत जावेद अख्तर ने लिखे हैं। विभाजन जैसे संवेदनशील विषय में संगीत कहानी के भावनात्मक असर को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
फिल्म का माहौल भी जानबूझकर भारी और भावनात्मक रखा गया है। जलते घर, पलायन करती भीड़, बिछड़ते परिवार और बदलते रिश्ते उस दौर की भयावहता को पर्दे पर उभारते हैं।
‘बंटवारा 1947’ देखनी चाहिए या नहीं?
अगर आपको इतिहास, विभाजन की कहानियों और भावनात्मक फिल्मों में दिलचस्पी है तो ‘बंटवारा 1947’ आपके लिए एक दिलचस्प विकल्प हो सकती है। फिल्म की ताकत इसका इंसानियत वाला संदेश, कलाकारों का अभिनय और सनी देओल-राजकुमार संतोषी की लंबे समय बाद हुई वापसी है।
फिल्म हर जगह हल्की-फुल्की मनोरंजन वाली नहीं है। इसका विषय गंभीर है और कई दृश्य भावनात्मक रूप से परेशान भी कर सकते हैं। लेकिन कहानी जिस सवाल को सामने रखती है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है—धर्म और पहचान से पहले क्या हम इंसान हैं?
हमारा फैसला
‘बंटवारा 1947’ इतिहास के एक दर्दनाक अध्याय को सिर्फ खून-खराबे की कहानी बनाकर नहीं छोड़ती, बल्कि उसके बीच बची इंसानियत को तलाशती है। सनी देओल का प्रभावशाली अंदाज, शबाना आजमी की मजबूत अदाकारी और प्रीति जिंटा की वापसी फिल्म को खास बनाती है।
यह फिल्म विभाजन को याद करने के साथ-साथ यह भी याद दिलाती है कि नफरत की सबसे अंधेरी घड़ी में भी इंसानियत की एक छोटी-सी रोशनी बहुत मायने रखती है।
रेटिंग: ⭐⭐⭐½/5
फिल्म: बंटवारा 1947
निर्देशक: राजकुमार संतोषी
मुख्य कलाकार: सनी देओल, शबाना आजमी, प्रीति जिंटा, अली फजल, करण देओल
संगीत: ए.आर. रहमान
गीत: जावेद अख्तर
रिलीज: 14 अगस्त 2026
शैली: पीरियड ड्रामा / हिस्टोरिकल ड्रामा
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